राही मासूम रजा,जिसने जुनून के लिए छोड़ दी थी नौकरी, 300 फिल्मों की लिखी कहानी, भाईचारे की थे मिसाल

New Delhi: महाभारत जैसे अद्वितीय टेलीविजन धारावाहिक के लेखक अपना अलग मुकाम बनाने वाले साहित्यकार राही मासूम रजा एक ऐसे शायर, लेखक और उपन्यासकार थे जिनके अल्फाज में हिन्दू-मुस्लिम के प्रति फिक्र झलकती है। आज  भी इनके कई नज्म लोगों की आंखों में आसू ले आते हैं।

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में एक सितम्बर 1927 को जन्में राही मासूम रजा बेहद खुले दिमाग के लेखक थे। रजा ने जो भी लिखा वह बहुत बेबाक लिखा। उन्हें किसी का कोई डर नहीं कोई खौफ नहीं था।रजा की कलम ने साम्प्रदायिकता के साथ-साथ सामंतवाद पर भी कड़े प्रहार किए। उनकी रचनाएं ‘आधा गांव’ और ‘नीम का पेड़’ इसकी शानदार मिसाल हैं।

राही मासूम रजा व्यक्तित्व के धनी एवं प्रसिद्ध साहित्यकार थे। महाभारत की पटकथा भी इन्होंने लिखी है और 1979 में ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ फ़िल्म के लिए फिल्म फेयर अवॉर्ड भी जीत चुके हैं।  राही का जन्म एक सम्पन्न एवं सुशिक्षित शिया परिवार में हुआ। राही के पिता गाजीपुर की ज़िला कचहरी में वकालत करते थे। राही की प्रारम्भिक शिक्षा गाजीपुर में हुई, बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गई थी। लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। साल 1960 में MA की डिग्री ली।

1964 में उन्होंने अपने शोधप्रबन्ध तिलिस्म-ए-होशरुबा में भारतीय सभ्यता और संस्कृति विषय पर P.hd करने के बाद राही  दो साल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू के टीचर बने और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले ‘बदरबाग’ में रहने लगे। यहीं रहते हुए उन्होंने आधा गांव, दिल एक सादा कागज, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी, उपन्यास व 1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए ‘वीर अब्दुल हामिद’ की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। बता दें कि राही मासूम रजा की उनकी ये सभी रचनाएं हिंदी में थीं।

बाद में मासूम रजा अलीगढ़ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी बन गए। अपने व्यक्तित्व के इस समय में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों से समाज के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए वे प्रयत्नशील रहे। सन 1968 से राही मुंबई में रहने लगे थे। वह अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जिससे उन्हें अच्छी खासी आमदनी मिल जाती थी। धीरे धीरे वह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण वह अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। मुम्बई में रहकर उन्होंने 300 फिल्में लिखी तथा टेलीविजन के लिए 100 से अधिक। जिनमें ‘महाभारत’ और ‘नीम का पेड़’ अविस्मरणीय हैं।

राही मासूम रज़ा का निधन 15 मार्च, 1992 को मुंबई में हुआ। राही जैसे लेखक कभी भुलाए नहीं जा सकते। उनकी रचनाएं हमारी उस गंगा-यमुना संस्कृति की प्रतीक हैं जो वास्तविक हिन्दुस्तान की परिचायक है।  राही मासूम रज़ा ने उर्दू शायरी हो या नज्म, फिल्म की कहानी हो या डायलॉग अपनी कलम से हर बार कलाम किया. पेश है उनकी नज़्म..  मेरा नाम मुसलमानों जैसा है। मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो। मेरे उस कमरे को लूटो जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ मेरा भी एक सन्देशा है मेरा नाम मुसलमानों जैसा हैमुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो। लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है, मेरे लहू से चुल्लु भर कर महादेव के मुँह पर फैंको, और उस जोगी से ये कह दो महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो, ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में गाढ़ा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।

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